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सरस्वती
हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार डॉक्टर बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर मिश्र जी श्रेष्ठ गीतकार, संपादक और राजभाषा से जुड़े उच्च अधिकारी रहे हैं| कुछ समय तक मैं और वे एक ही संस्थान – हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड में रहे और मुझे एक अवसर और याद आता है जब मैंने…
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सुभाव ऐसा था!
फ़रेब दे ही गया ‘नूर’ उस नज़र का ख़ुलूस,फ़रेब खा ही गया मैं, सुभाव ऐसा था| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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लहू का रचाव ऐसा था!
वो जिसका ख़ून था वो भी शिनाख्त कर न सका,हथेलियों पे लहू का रचाव ऐसा था| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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हमारा झुकाव ऐसा था!
फिर उसके बाद झुके तो झुके ख़ुदा की तरफ़,तुम्हारी सम्त हमारा झुकाव ऐसा था| कृष्ण बिहारी ‘नूर’