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क़दमों पर मैं अपना सर रखूँ!
मौत तो आनी है तो फिर मौत का क्यूँ डर रखूँ, ज़िंदगी आ तेरे क़दमों पर मैं अपना सर रखूँ | कुँअर बेचैन
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मद-मस्त पुरवाई सी तुम!
शोर की इस भीड़ में ख़ामोश तन्हाई सी तुम, ज़िंदगी है धूप, तो मद-मस्त पुरवाई सी तुम| कुँअर बेचैन
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इन्हें निकाल के चल!
अगर ये पाँव में होते तो चल भी सकता था,ये शूल दिल में चुभे हैं इन्हें निकाल के चल। कुँअर बेचैन
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बिना सवाल के चल!
कि उसके दर पे बिना माँगे सब ही मिलता है,चला है रब की तरफ़ तो बिना सवाल के चल। कुँअर बेचैन
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उसको न ऐसे टाल के चल!
कहे जो तुझसे उसे सुन, अमल भी कर उस पर,ग़ज़ल की बात है उसको न ऐसे टाल के चल। कुँअर बेचैन
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देखभाल के चल!
ये लफ़्ज़ आईने हैं मत इन्हें उछाल के चल,अदब की राह मिली है तो देखभाल के चल। कुँअर बेचैन
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हम दरिया का बहता पानी!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय कुमार शिव जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| कुमार शिव जी को मैंने पहली बार आकाशवाणी, जयपुर में रिकॉर्ड की जा रहे एक कवि सम्मेलन में सुना था| उनकी यह पंक्तियाँ मुझे हमेशा याद रहती हैं- ‘फ्यूज बल्बों के अद्भुद समारोह में,…
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ये मोहब्बतों की कहानियाँ!
मुझे इश्तहार-सी लगती हैं, ये मोहब्बतों की कहानियाँ,जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो| बशीर बद्र
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कोई आयेगा कोई जायेगा!
अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा,तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो| बशीर बद्र