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मेरी पराश्रितता – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले…
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वज़न है सम्भलके उठाना!
ये तन्हाईयाँ, याद भी, चान्दनी भी,गज़ब का वज़न है सम्भलके उठाना। कन्हैयालाल नंदन
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मुहब्बत है या कारखाना!
अभी मुझसे, फिर आपसे फिर और किसी से,मियाँ ये मुहब्बत है या कारखाना। कन्हैयालाल नंदन
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जानलेवा है ये दरमियाना!
मुझे वो मिलेगा ये मुझको यकीं है,बड़ा जानलेवा है ये दरमियाना| कन्हैयालाल नंदन
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दो घूँट पानी पिलाना!
नदी की कहानी कभी फिर सुनाना,मैं प्यासा हूँ दो घूँट पानी पिलाना। कन्हैयालाल नंदन
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उजाले की खुशबू
एक बार फिर से मैं कवि सम्मेलनों में अपने गीतों के माध्यम से श्रोताओं के मन में अपनी अमिट छाप बनाने वाले सृजनधर्मी गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी ने अपने गीतों में अभिव्यक्ति की बहुत मंज़िलें पार की हैं, सरल भाषा में अक्सर बहुत गहरी बात…