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खिंचता चला आए ख़ुद भी!
लुत्फ़ तो जब है तअल्लुक़ में कि वो शहरे-जमाल,कभी खींचे कभी खिंचता चला आए ख़ुद भी| अहमद फ़राज़
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तो वो याद दिलाए ख़ुद भी!
ऐसा ज़ालिम कि अगर ज़िक्र में उसके कोई ज़ुल्म,हमसे रह जाए तो वो याद दिलाए ख़ुद भी| अहमद फ़राज़
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हमें याद न आए खुद भी!
कितने ग़म थे कि ज़माने से छुपा रक्खे थे,इस तरह से कि हमें याद न आए खुद भी| अहमद फ़राज़
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मंज़िल थे बजाए ख़ुद भी!
यूँ तुझे ढूँढ़ने निकले के न आए ख़ुद भी,वो मुसाफ़िर कि जो मंज़िल थे बजाए ख़ुद भी| अहमद फ़राज़
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मिट्टी बोलती है!
फिर से एक बार मैं अपने एक अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी ने नवगीत के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी| बहुत से अमर नवगीतों की रचना उन्होंने की है, जिनमें आम आदमी के संघर्ष को वाणी दी गई है| लीजिए आज…
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आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया!
उड़ते-उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया,रोते-रोते बैठ गई आवाज़ किसी सौदाई की| क़तील शिफ़ाई
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कौन सियाही घोल रहा था!
कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में,मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की| क़तील शिफ़ाई
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अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है!
अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की,तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की| क़तील शिफ़ाई
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गम छुपाने के लिए भी!
हो खुशी भी उनको हासिल ये ज़रूरी तो नहीं,गम छुपाने के लिए भी मुस्कुरा लेते हैं लोग| क़तील शिफ़ाई
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बिजलियाँ खुद अपने गुलशन पर!
है बजा उनकी शिकायत लेकिन इसका क्या इलाज,बिजलियाँ खुद अपने गुलशन पर गिरा लेते हैं लोग| क़तील शिफ़ाई