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कितने शहर समंदर के हो गये!
रोते हो एक जजीरा-ए-जाँ को “फ़राज़” तुम,देखो तो कितने शहर समंदर के हो गये| अहमद फ़राज़
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कू-ए-सितमगर के हो गये!
अब के ना इंतेज़ार करें चारागर का हम,अब के गये तो कू-ए-सितमगर के हो गये| अहमद फ़राज़
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ख़ुद उसी काफिर के हो गये!
समझा रहे थे मुझ को सभी नसेहान-ए-शहर,फिर रफ्ता रफ्ता ख़ुद उसी काफिर के हो गये| अहमद फ़राज़
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हम भी तो पत्थर के हो गये!
ऐ याद-ए-यार तुझ से करें क्या शिकायतें,ऐ दर्द-ए-हिज्र हम भी तो पत्थर के हो गये| अहमद फ़राज़
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गैर को दिल से लगा लिया!
फिर यूँ हुआ के गैर को दिल से लगा लिया,अंदर वो नफरतें थीं के बाहर के हो गये| अहमद फ़राज़
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उसी दर के हो गये!
तुझसे बिछड़ के हम भी मुकद्दर के हो गये,फिर जो भी दर मिला है उसी दर के हो गये| अहमद फ़राज़
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और वही यादें-यादें!
आज फिर दिल ने कहा आओ भुला दें यादें,ज़िंदगी बीत गई और वही यादें-यादें| अहमद फ़राज़
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हाल-चाल ठीक-ठाक है!
आज गुलज़ार साहब का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ| गुलज़ार साहब शायरी में प्रयोग करने के लिए जाने जाते हैं, एक अनूठे अंदाज़ में वो अक्सर अपनी बात कह जाते हैं| गुलज़ार साहब का यह गीत फिल्म ‘मेरे अपने’ के लिए किशोर कुमार साहब और मुकेश जी के स्वरों में फिल्माया गया था…
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महफ़िले-जानाँ से उठ आए!
यार से हमको तगाफ़ुल का गिला है बेजा,बारहा महफ़िले-जानाँ से उठ आए ख़ुद भी| अहमद फ़राज़