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लेकिन कब ऐसा होता है!
पहले भी कुछ लोगों ने जौ बो कर गेहूँ चाहा था,हम भी इस उम्मीद में हैं लेकिन कब ऐसा होता है| जावेद अख़्तर
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क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे!
उन चराग़ों में तेल ही कम था,क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे| जावेद अख़्तर
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यूँ बेख़बर है वो जैसे!
मेरे वुजूद से यूँ बेख़बर है वो जैसे,वो एक धूपघड़ी है मैं रात का पल हूँ| जावेद अख़्तर
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सूर्य और दीपनिष्ठा
एक श्रेष्ठ व्यक्ति और कवि जो सांसद भी रहे हैं और संसदीय राजभाषा समिति का एक सदस्य होने के नाते उन्होंने राजभाषा हिन्दी की प्रगति हेतु भी प्रयास किए हैं, ऐसे स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की तीन छोटी छोटी रचनाएं आज शेयर कर रहा हूँ| बैरागी जी का कविता पढ़ने का अपना अनूठा अंदाज़ था,…
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बात हुई है उसे भुलाने में!
वह शक्ल पिघली तो हर शय में ढल गयी जैसे,अजीब बात हुई है उसे भुलाने में| जावेद अख़्तर
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ज़िंदगी से यूँ खेले!
अपनी वजहे-बरबादी सुनिये तो मज़े की है,ज़िंदगी से यूँ खेले जैसे दूसरे की है| जावेद अख़्तर
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इस गुल में कोई सोता क्या!
गली में शोर था मातम था और होता क्या,मैं घर में था मगर इस गुल में कोई सोता क्या| जावेद अख़्तर