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उसे भूलने की दुआ करो!
अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा,तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो| बशीर बद्र
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ये नये मिज़ाज का शहर है!
कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो| बशीर बद्र
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उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो!
यूँ ही बे-सबब न फिरा करो, कोई शाम घर में भी रहा करो,वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो| बशीर बद्र
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क्या करेंगे हम भजन होकर!
आज फिर से प्रस्तुत है मेरे अत्यंत प्रिय कवि और गीतकार आदरणीय सोम ठाकुर जी का एक गीत| सोम जी ने गीतों में अनेक प्रयोग किए हैं और अनेक प्रेम से सराबोर गीत तो लिखे ही हैं, वहीं राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभाषा प्रेम के भी कुछ बहुत सुंदर गीत उन्होंने लिखे हैं| उनके अनेक गीत समय-समय…
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और करे दीवाना क्या!
जब शहर के लोग न रस्ता दें क्यूं बन में न जा बिसराम करें।दीवानों की सी न बात करे तो और करे दीवाना क्या॥ इब्ने इंशा
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यूं माटी में मिल जाना क्या!
उसको भी जला दुखते हुए मन एक शोला लाल भभूका बन।यूं आंसू बन बह जाना क्या यूं माटी में मिल जाना क्या॥ इब्ने इंशा
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वो दौलत क्या वो ख़ज़ाना क्या!
उस हुस्न के सच्चे मोती को हम देख सकें पर छू न सकें।जिसे देख सकें पर छू न सकें वो दौलत क्या वो ख़ज़ाना क्या॥ इब्ने इंशा
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वो बात भी थी अफ़साना क्या!
उस रोज़ जो उनको देखा है अब ख़्वाब का आलम लगता है।उस रोज़ जो उनसे बात हुई वो बात भी थी अफ़साना क्या॥ इब्ने इंशा
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शर्माना क्या घबराना क्या!
फिर हिज्र की लम्बी रात मियाँ संजोग की तो यही एक घड़ी।जो दिल में है लब पर आने दो शर्माना क्या घबराना क्या॥ इब्ने इंशा
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सजनी से करोगे बहाना क्या!
शब बीती चाँद भी डूब गया ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े में।क्यूँ देर गए घर आए हो सजनी से करोगे बहाना क्या॥ इब्ने इंशा