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दरो-दीवार सजाकर देखो!
पत्थरों में भी ज़बाँ होती है दिल होते हैं,अपने घर के दरो-दीवार सजाकर देखो | निदा फ़ाज़ली
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दिल की धड़कन को भी!
सिर्फ़ आँखों से ही दुनिया नहीं देखी जाती,दिल की धड़कन को भी बीनाई बनाकर देखो | निदा फ़ाज़ली
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किताबों को हटाकर देखो!
धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखोज़िन्दगी क्या है, किताबों को हटाकर देखो | निदा फ़ाज़ली
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मन कुछ का कुछ और हो गया!
स्वर्गीय रामानंद दोषी जी का एक गीत आज प्रस्तुत है| स्वर्गीय दोषी जी प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका कादंबिनी के संपादक भी रहे थे और बहुत अच्छे गीतकार थे, मन की अवस्थाओं का चित्रण उन्होंने अपने कुछ गीतों में बड़ी बारीकी से किया है| उनका प्रसिद्ध गीत है- ‘मन होता है पारा, ऐसे देखा नहीं करो’| लीजिए…
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तहे-गर्द होगा दबा हुआ!
वही ख़त के जिसपे जगह-जगह, दो महकते होंठों के चाँद थे,किसी भूले बिसरे से ताक़ पर, तहे-गर्द होगा दबा हुआ। बशीर बद्र
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वो दरख़्त अनार का क्या हुआ!
वही शहर है वही रास्ते, वही घर है और वही लान भी,मगर इस दरीचे से पूछना, वो दरख़्त अनार का क्या हुआ । बशीर बद्र
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मेहन्दियों से रचा हुआ!
मुझे हादिसों ने सजा-सजा के, बहुत हसीन बना दिया,मेरा दिल जैसे दुल्हन का हाथ हो, मेहन्दियों से रचा हुआ। बशीर बद्र
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कोई पेड़ प्यास से मर रहा है!
कई मील रेत को काटकर, कोई मौज फूल खिला गई,कोई पेड़ प्यास से मर रहा है, नदी के पास खड़ा हुआ । बशीर बद्र
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कहीं, आँसुओं से लिखा हुआ!
जिसे ले गई अभी हवा, वे वरक़ था दिल की किताब का,कही आँसुओं से मिटा हुआ, कहीं, आँसुओं से लिखा हुआ। बशीर बद्र
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न कहा हुआ न सुना हुआ!
कोई फूल धूप की पत्तियों में, हरे रिबन से बंधा हुआ।वो ग़ज़ल का लहजा नया-नया, न कहा हुआ न सुना हुआ। बशीर बद्र