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औरों को समझाया है!
कभी-कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है,जिन बातों को खुद नहीं समझे, औरों को समझाया है| निदा फ़ाज़ली
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रोता हुआ सा कुछ!
फ़ुर्सत ने आज घर को सजाया कुछ इस तरह,हर शय से मुस्कुराता है रोता हुआ सा कुछ| निदा फ़ाज़ली
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उठेगी तुम्हारी नज़र धीरे-धीरे!
आज स्वर्गीय मजरूह सुल्तानपुरी साहब का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत 1963 में रिलीज़ हुई फिल्म – ‘एक राज़’ के लिए लता मंगेशकर जी ने अपने सुमधुर स्वर में गाया था| इसका मधुर संगीत तैयार किया था चित्रगुप्त जी ने| लीजिए प्रस्तुत है, मजरूह साहब का लिखा और स्वर सम्राज्ञी लता…
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बनता बिखरता हुआ सा कुछ!
साहिल की गीली रेत पर बच्चों के खेल-सा,हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ| निदा फ़ाज़ली
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खोया हुआ सा कुछ!
होता है यूँ भी, रास्ता खुलता नहीं कहीं,जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ| निदा फ़ाज़ली
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उलझा हुआ सा कुछ!
देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ,हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ| निदा फ़ाज़ली
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ज़रा हाथ बढाकर देखो!
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है,चाँद जब चमके ज़रा हाथ बढाकर देखो | निदा फ़ाज़ली