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क्या जाने किस भेस में बाबा!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी फिल्म जगत के एक अनूठे गीतकार स्वर्गीय पंडित भरत व्यास जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| भरत व्यास जी ने हिन्दी फिल्मों को कुछ बहुत प्यारे गीत दिए हैं, जैसे- ‘आधा है चंद्रमा, रात आधी’, ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम’, ‘आ लौट के आ जा मेरे…
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कोई बात नहीं होती है!
जब भी मिलते हैं तो कहते हैं कैसे हो “शकील”,इस से आगे तो कोई बात नहीं होती है| शकील बदायूँनी
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मगर रात नहीं होती है!
हाल-ए-दिल पूछने वाले तेरी दुनिया में कभी,दिन तो होता है मगर रात नहीं होती है| शकील बदायूँनी
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आँख से बरसात नहीं होती है!
छुप के रोता हूँ तेरी याद में दुनिया भर से,कब मेरी आँख से बरसात नहीं होती है| शकील बदायूँनी
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न देखा करें आईना कभी!
आप लिल्लाह न देखा करें आईना कभी,दिल का आ जाना बड़ी बात नहीं होती है| शकील बदायूँनी
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मगर बात नहीं होती है!
कैसे कह दूँ कि मुलाकात नहीं होती है,रोज़ मिलते हैं मगर बात नहीं होती है| शकील बदायूँनी
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सलाम तक न पहुँचे!
ये अदा-ए-बेनियाज़ी तुझे बेवफ़ा मुबारक,मगर ऐसी बेरुख़ी क्या कि सलाम तक न पहुँचे। शकील बदायूँनी
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कहीं शाम तक न पहुँचे!
नयी सुबह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है,ये सहर भी रफ़्ता-रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे। शकील बदायूँनी
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कभी जाम तक न पहुँचे!
मैं नज़र से पी रहा था कि ये दिल ने बददुआ दी,तेरा हाथ ज़िंदगी-भर कभी जाम तक न पहुँचे। शकील बदायूँनी