Category: Uncategorized
-
वो बस्ती भी जल रही है!
न जलने पाते थे जिसके चूल्हे भी हर सवेरे,सुना है कल रात से वो बस्ती भी जल रही है| जावेद अख़्तर
-
तुम्हारी दीवार गल रही है!
मैं क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन,मेरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है| जावेद अख़्तर
-
ज़ंजीर धीरे-धीरे पिघल रही है!
जो मुझको ज़िंदा जला रहे हैं वो बेख़बर हैं,कि मेरी ज़ंजीर धीरे-धीरे पिघल रही है| जावेद अख़्तर
-
उँगलियों से फिसल रही है!
वो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है,ज़मीन सूरज की उँगलियों से फिसल रही है| जावेद अख़्तर
-
टूटे हुए खिलौने का!
है पाश-पाश मगर फिर भी मुस्कुराता है,वो चेहरा जैसे हो टूटे हुए खिलौने का | जावेद अख़्तर
-
कोई न रंज खोने का!
ये ज़िन्दगी भी अजब कारोबार है कि मुझे,ख़ुशी है पाने की कोई न रंज खोने का| जावेद अख़्तर
-
फिर दर्द कोई बोने का!
जो फ़स्ल ख़्वाब की तैयार है तो ये जानो,कि वक़्त आ गया फिर दर्द कोई बोने का| जावेद अख़्तर
-
अल्फ़ाज़ में पिरोने का!
अगर पलक पे है मोती तो ये नहीं काफ़ी,हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का| जावेद अख़्तर
-
शौक़ है क्या आस्तीं भिगोने का!
बहाना ढूँढते रहते हैं कोई रोने का,हमें ये शौक़ है क्या आस्तीं भिगोने का| जावेद अख़्तर
-
भीड़ में खो गये!
ज़नाब सुदर्शन फ़ाकिर साहब का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| फ़ाकिर साहब ने बहुत सी प्यारी ग़ज़लें और शेर लिखे हैं जिनको जगजीत सिंह जी और अनेक अन्य प्रसिद्ध गायकों ने गाया है| आज के इस गीत में भी गाँव से जुड़ी यादों को बड़ी खूबसूरती से अभिव्यक्त किया गया है| लीजिए आज…