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टी०वी० पर भेड़िए!
स्वर्गीय कुबेरदत्त जी किसी ज़माने में मेरे मित्र हुआ करते थे, जब वे बेरोज़गार थे, संघर्ष कर रहे थे, बहुत अच्छे गीत लिखते थे| बाद में वे दूरदर्शन में पदस्थापित हो गए, काफी प्रगति की उन्होंने, दूरदर्शन पर बहुत सुंदर कार्यक्रम भी दिए, साहित्यिक गोष्ठियों आदि के तो वे विशेषज्ञ थे, लेकिन दूरदर्शन में जाने…
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वो बस्ती भी जल रही है!
न जलने पाते थे जिसके चूल्हे भी हर सवेरे,सुना है कल रात से वो बस्ती भी जल रही है| जावेद अख़्तर
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तुम्हारी दीवार गल रही है!
मैं क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन,मेरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है| जावेद अख़्तर
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ज़ंजीर धीरे-धीरे पिघल रही है!
जो मुझको ज़िंदा जला रहे हैं वो बेख़बर हैं,कि मेरी ज़ंजीर धीरे-धीरे पिघल रही है| जावेद अख़्तर
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उँगलियों से फिसल रही है!
वो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है,ज़मीन सूरज की उँगलियों से फिसल रही है| जावेद अख़्तर