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सुनहरा दिखाई पड़ता है!
चमकती रेत पर ये ग़ुस्ल-ए-आफ़ताब तेरा,बदन तमाम सुनहरा दिखाई पड़ता है| जाँ निसार अख़्तर
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अधूरा दिखाई पड़ता है!
न कोई ख़्वाब न कोई ख़लिश न कोई ख़ुमार,ये आदमी तो अधूरा दिखाई पड़ता है| जाँ निसार अख़्तर
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प्यार का भूखा दिखाई देता है!
चलो कि अपनी मोहब्बत सभी को बाँट आएँ,हर एक प्यार का भूखा दिखाई देता है| जाँ निसार अख़्तर
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कोई चेहरा दिखाई पड़ता है!
हमारे शहर में बे-चेहरा लोग बसते हैं,कभी-कभी कोई चेहरा दिखाई पड़ता है| जाँ निसार अख़्तर
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सवेरा दिखाई पड़ता है!
उफ़ुक़ अगरचे पिघलता दिखाई पड़ता है,मुझे तो दूर सवेरा दिखाई पड़ता है| जाँ निसार अख़्तर
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सागर के किनारे!
हिन्दी साहित्य की महान विभूति स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी तारसप्तक और तीन सप्तकों के माध्यम से अनेक कवियों का साहित्य हमारे सामने लाने का माध्यम बने थे| अज्ञेय जी का उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ एक महान रचना है और भी अनेक उपन्यास और…