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बिछड़ना ज़रूर था!
दुनिया है ये किसी का न इसमें क़ुसूर था,दो दोस्तों का मिल के बिछड़ना ज़रूर था| आनंद नारायण ‘मुल्ला’
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सत्य!
बाबा नागार्जुन अपने समय के एक महत्वपूर्ण कवि रहे हैं, बड़े फक्कड़ अंदाज़ में बेबाक ढंग से अपनी बात रखते थे| आज की बाबा नागार्जुन जी की कविता, जैसा कि इसके कथ्य से ही स्पष्ट है, आपातकाल में लिखी गई थी| उस समय बाबा नागार्जुन जेल में भी रहे थे| लीजिए आज प्रस्तुत है बाबा…
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तुमने भी अगर देखा है!
क्या ग़लत है जो मैं दीवाना हुआ, सच कहना,मेरे महबूब को तुमने भी अगर देखा है| मजरूह सुल्तानपुरी
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मुश्किल से इधर देखा है!
आज इस एक नज़र पर मुझे मर जाने दो,उसने लोगों बड़ी मुश्किल से इधर देखा है| मजरूह सुल्तानपुरी
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दीदा-ए-तर देखा है!
हम पे हँसती है जो दुनियाँ उसे देखा ही नहीं,हमने उस शोख को जो दीदा-ए-तर देखा है| मजरूह सुल्तानपुरी
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तुम्हें एक नज़र देखा है!
पहले सौ बार इधर और उधर देखा है,तब कहीं जा के तुम्हें एक नज़र देखा है| मजरूह सुल्तानपुरी
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गुनहगार की तरह!
‘मजरूह’ लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम,हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह| मजरूह सुल्तानपुरी
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निगाह-ए-यार की तरह!
वो तो हैं कहीं और मगर दिल के आस पास,फिरती है कोई शै निगाह-ए-यार की तरह| मजरूह सुल्तानपुरी
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दौलत-ए-बेदार की तरह!
इस कू-ए-तिश्नगी में बहुत है के एक जाम,हाथ आ गया है दौलत-ए-बेदार की तरह| मजरूह सुल्तानपुरी
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हर निगाह ख़रीदार की तरह!
हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह,उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह| मजरूह सुल्तानपुरी