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गुम हो गया हूँ मैं!
ऊपर के चेहरे-मोहरे से धोखा न खाइए,मेरी तलाश कीजिए, गुम हो गया हूँ मैं| निदा फ़ाज़ली
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बिखरता रहा हूँ मैं!
मैं मौसमों के जाल में जकड़ा हुआ दरख़्त,उगने के साथ-साथ बिखरता रहा हूँ मैं| निदा फ़ाज़ली
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मुझे निकाल के पत्थर बना दिया!
मुझसे मुझे निकाल के पत्थर बना दिया,जब मैं नहीं रहा हूँ तो पूजा गया हूँ मैं| निदा फ़ाज़ली
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आप तमाशा रहा हूँ मैं!
देखा गया हूँ मैं कभी सोचा गया हूँ मैं,अपनी नज़र में आप तमाशा रहा हूँ मैं| निदा फ़ाज़ली
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अवशिष्ट !
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना बहुमूल्य योगदान करने वाले और धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ | लीजिए आज प्रस्तुत है, जीवन पर एक अलग प्रकार की दृष्टि डालने वाला स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का यह गीत…
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बैठ के अपने यारों में!
सब का दिल हो अपने जैसा अनहोनी सी बात लगे,’नक़्श’ यह क्या सोचा करते हो बैठ के अपने यारों में। नक़्श लायलपुरी
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इश्क़ ने जब जब रक़्स किया है!
काँप उठे हैं शाहों के दिल, महलों की बुनियाद हिली,इश्क़ ने जब जब रक़्स किया है शाहों के दरबारों में। नक़्श लायलपुरी
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बस्ती के चौबारों में!
हर पनघट पर मेरे फ़साने, चौपालों पर ज़िक्र मेरा,मेरी ही बातें होती हैं बस्ती के चौबारों में। नक़्श लायलपुरी
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इतना दर्द कहाँ से आया!
गीत है या फ़रियाद किसी की, नग़मा है या दिल की तड़प,इतना दर्द कहाँ से आया साज़ों की झंकारों में। नक़्श लायलपुरी
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चाँदी जैसी लहरें गिरती!
जाने कितनी नदियों को धनवान बनाया झरनों ने,चाँदी जैसी लहरें गिरती देखी हैं कोहसारों में। नक़्श लायलपुरी