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घर निकलने लगते हैं!
पुराने शहरों के मंज़र निकलने लगते हैं,ज़मीं जहाँ भी खुले घर निकलने लगते हैं| राहत इन्दौरी
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चाँद-सितारों का है मौला खैर!
और क़यामत मेरे चराग़ों पर टूटी,झगड़ा चाँद-सितारों का है मौला खैर| राहत इन्दौरी
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दुनियादारों का है मौला खैर!
दुनिया से बाहर भी निकलकर देख चुके,सब कुछ दुनियादारों का है मौला खैर| राहत इन्दौरी
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रिश्तेदारों का है मौला खैर!
इस दुनिया में तेरे बाद मेरे सर पर,साया रिश्तेदारों का है मौला खैर| राहत इन्दौरी
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यारों का है मौला खैर!
दुश्मन से तो टक्कर ली है सौ-सौ बार,सामना अबके यारों का है मौला खैर| राहत इन्दौरी
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बोझ अँधियारों का है मौला खैर!
सर पर बोझ अँधियारों का है मौला खैर,और सफ़र कोहसारों का है मौला खैर| राहत इन्दौरी
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गीत के जितने कफ़न हैं!
एक बार फिर मैं आज मेरे लिए गुरुतुल्य और बड़े भाई जैसे रहे, श्रेष्ठ रचनाकार और अत्यंत सरल हृदय गीतकार स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में भी डॉक्टर बेचैन जी ने जीवन पर एक अलग तरीके से निगाह डाली है| लीजिए आज प्रस्तुत है, जीवन पर…