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यही जन्नत निशाँ मेरा!
कहीं बारूद फूलों में, कहीं शोले शिगूफ़ों में,ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे, है यही जन्नत निशाँ मेरा| बेकल उत्साही
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ये अन्दाज़-ए-बयाँ मेरा!
पड़ेगा वक़्त जब मेरी दुआएँ काम आएंगी,अभी कुछ तल्ख़ लगता है ये अन्दाज़-ए-बयाँ मेरा| बेकल उत्साही
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गुबारे-कारवाँ मेरा!
बचाकर रख उसे मंज़िल से पहले रूठने वाले,तुझे रस्ता दिखाएगा गुबारे-कारवाँ मेरा| बेकल उत्साही
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तुम जला दो आशियाँ मेरा!
सुकूँ पाएँ चमन वाले हर इक घर रोशनी पहुँचे,मुझे अच्छा लगेगा तुम जला दो आशियाँ मेरा| बेकल उत्साही
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कुछ नहीं पूछा -रवीन्द्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहराने का दिन है| प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया…
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और फैला है धुआँ मेरा!
किसी बस्ती को जब जलते हुए देखा तो ये सोचा,मैं ख़ुद ही जल रहा हूँ और फैला है धुआँ मेरा| बेकल उत्साही
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ठिकाना है कहाँ मेरा!
सुनहरी सरज़मीं मेरी, रुपहला आसमाँ मेरा,मगर अब तक नहीं समझा, ठिकाना है कहाँ मेरा| बेकल उत्साही
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सुर्ख़ियों मे बिखेरता है मुझे!
सुब्ह अख़बार की हथेली पर,सुर्ख़ियों मे बिखेरता है मुझे| बेकल उत्साही