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कहानीकार हो ऐसा नहीं होता!
कहानी में तो किरदारों को जो चाहे बना दीजे,हक़ीक़त भी कहानीकार हो ऐसा नहीं होता| निदा फ़ाज़ली
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रोज़ ही मंझदार हो ऐसा नहीं होता!
हरेक कश्ती का अपना तज़ुर्बा होता है दरिया में,सफर में रोज़ ही मंझदार हो ऐसा नहीं होता| निदा फ़ाज़ली
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एक ही से प्यार हो ऐसा नहीं होता!
जो हो इक बार, वह हर बार हो ऐसा नहीं होता,हमेशा एक ही से प्यार हो ऐसा नहीं होता| निदा फ़ाज़ली
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बूढ़ा चांद!
आज फिर से मैं छायावाद युग के एक स्तंभ कवि स्वर्गीय सुमित्रा नंदन पंत जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता को भी उस युग की कविता का एक जीवंत दस्तावेज माना जा सकता है| हर युग में कविता ने एक नया स्वरूप धारण किया है| लीजिए आज प्रस्तुत है सुमित्रा नंदन…
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ज़िन्दगी क़ैद है सीता की तरह!
अपने हाथों को पढ़ा करता हूँकभी क़ुरआँ कभी गीता की तरह,चन्द रेखाओं में सीमाओं मेंज़िन्दगी क़ैद है सीता की तरह| कैफ़ी आज़मी
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तक़दीर में ख़तरा भी नहीं!
कोई कहता था समुन्दर हूँ मैंऔर मेरी जेब में क़तरा भी नहीं,ख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँअब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहीं| कैफ़ी आज़मी
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एक आदत है जिए जाना भी!
नब्ज़ बुझती भी भड़कती भी है,दिल का मामूल है घबराना भी,रात अन्धेरे ने अन्धेरे से कहा,एक आदत है जिए जाना भी| कैफ़ी आज़मी
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कौन रखता है मज़ारों का हिसाब!
जिस्म से रूह तलक रेत ही रेतन कहीं धूप न साया न सराब,कितने अरमान हैं किस सहरा मेंकौन रखता है मज़ारों का हिसाब| कैफ़ी आज़मी
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अब रोज़ ही आ जाते हैं!
रोज़ बसते हैं कई शहर नएरोज़ धरती में समा जाते हैं,ज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मीवो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं| कैफ़ी आज़मी