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मुझे गिलास बड़े दे !
यहाँ लिबास, की क़ीमत है आदमी की नहीं,मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे| बशीर बद्र
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लफ्ज़ों को मोहतरम कर दे!
सँवार नोक पलक अबरूओं में ख़म कर दे,गिरे पड़े हुए लफ्ज़ों को मोहतरम कर दे| बशीर बद्र
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तुम कनक किरन!
आज फिर से मैं छायावाद युग के एक और स्तंभ कवि स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी ने जहां कामायनी, आँसू आदि जैसी अमर रचनाएं लिखी हैं, वहीं भारतीय संस्कृति के गौरव की पताका फहराने वाली अनेक कविताएं एवं नाटक भी लिखे थे| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय…
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अब तक डरी नहीं है दुनिया!
भाग रही है गेंद के पीछेजाग रही है चाँद के नीचे,शोर भरे काले नारों सेअब तक डरी नहीं है दुनिया निदा फ़ाज़ली
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अब तक खुली नहीं है दुनिया!
घर में ही मत इसे सजाओ,इधर-उधर भी ले के जाओ|यूँ लगता है जैसे तुमसेअब तक खुली नहीं है दुनिया| निदा फ़ाज़ली
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सबकी वही नहीं है दुनिया!
चार घरों के एक मुहल्लेके बाहर भी है आबादी,जैसी तुम्हें दिखाई दी हैसबकी वही नहीं है दुनिया| निदा फ़ाज़ली
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तुमसे मिली नहीं है दुनिया!
जितनी बुरी कही जाती हैउतनी बुरी नहीं है दुनिया,बच्चों के स्कूल में शायदतुमसे मिली नहीं है दुनिया| निदा फ़ाज़ली
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दिल की हार हो ऐसा नहीं होता!
कहीं तो कोई होगा जिसको अपनी भी ज़रूरत हो,हरेक बाज़ी में दिल की हार हो ऐसा नहीं होता| निदा फ़ाज़ली
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सिखा देती है चलना ठोकरें भी!
सिखा देती है चलना ठोकरें भी राहगीरों को,कोई रस्ता सदा दुशवार हो ऐसा नहीं होता| निदा फ़ाज़ली