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न वो ख़्वाब ही तेरा ख़्वाब था!
न वो आँख ही तेरी आँख थी, न वो ख़्वाब ही तेरा ख़्वाब था,दिले मुन्तज़िर तो है किसलिए, तेरा जागना उसे भूल जा। अमजद इस्लाम
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मेरे साथ आ उसे भूल जा!
मैं तो गुम था तेरे ही ध्यान में, तेरी आस तेरे गुमान में,सबा कह गयी मेरे कान में, मेरे साथ आ उसे भूल जा। अमजद इस्लाम
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वो तेरे नसीब की बारिशें!
वो तेरे नसीब की बारिशें, किसी और छत पे बरस गईं,दिले-बेख़बर मेरी बात सुन, उसे भूल जा उसे भूल जा। अमजद इस्लाम
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जो नहीं मिला उसे भूल जा!
कहाँ आके रुकने थे रास्ते, कहाँ मोड़ था उसे भूल जा,जो मिल गया उसे याद रख, जो नहीं मिला उसे भूल जा। अमजद इस्लाम
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विसर्जन!
छायावाद युग के कवियों और कविताओं का उल्लेख महादेवी जी को याद की बिना कैसे पूरा हो सकता है| महादेवी जी का भी उस युग के साहित्य में अमूल्य योगदान है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी की यह कविता – निशा की, धो देता राकेशचाँदनी में जब अलकें खोल,कली से कहता था…
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सुलगती रेत रखकर चल दिया!
मेरी मुट्ठी में सुलगती रेत रखकर चल दिया,कितनी आवाज़ें दिया करता था ये दरिया मुझे| बशीर बद्र
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इस तरह माँगा मुझे!
तुमने देखा है किसी मीरा को मंदिर में कभी,एक दिन उसने ख़ुदा से इस तरह माँगा मुझे| बशीर बद्र
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इस तरह से कर गया तन्हा मुझे!
जिस तरह वापस कोई ले जाए अपनी छुट्टियाँ,जाने वाला इस तरह से कर गया तन्हा मुझे| बशीर बद्र
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ख़ुदा ने दे दिया क्या-क्या मुझे!
चाँद चेहरा, जुल्फ दरिया, बात खुशबू, दिल चमन,ये तुम्हें देकर ख़ुदा ने दे दिया क्या-क्या मुझे| बशीर बद्र