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उस जाने-जहाँ ने लिख दिया!
हो सजावारे-सजा क्यों जब मुकद्दर में मेरे,जो भी उस जाने-जहाँ ने लिख दिया, मैंने किया| अहमद फ़राज़
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वो मेरी पहली शिकस्त!
वो मेरी पहली मोहब्बत, वो मेरी पहली शिकस्त,फिर तो पैमाने-वफ़ा सौ मर्तबा मैंने किया| अहमद फ़राज़
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मुश्किलों से तर्जुमा मैंने किया!
कैसे नामानूस लफ़्ज़ों की कहानी था वो शख्स,उसको कितनी मुश्किलों से तर्जुमा मैंने किया| अहमद फ़राज़
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बुत को खुदा मैंने किया!
संगदिल है वो तो क्यूं इसका गिला मैंने किया,जबकि खुद पत्थर को बुत, बुत को खुदा मैंने किया| अहमद फ़राज़
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दुपहरिया!
आज मैं स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| केदारनाथ सिंह जी हिन्दी के प्रतिष्ठित रचनाकार रहे हैं और उनको ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ सहित अनेक सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे| आज का यह नवगीत अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल एक किया गया था| लीजिए आज प्रस्तुत है…
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तेरे साहिलों पे खिला था जो!
तुझे चाँद बन के मिला था जो, तेरे साहिलों पे खिला था जो,वो था एक दरिया विसाल का, सो उतर गया उसे भूल जा। अमजद इस्लाम
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वो फ़लक कि जिसपे मिले थे हम!
तो ये किसलिए शबे-हिज्र के उसे हर सितारे में देखना,वो फ़लक कि जिसपे मिले थे हम, कोई और था उसे भूल जा। अमजद इस्लाम
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जो बिसाते-जाँ ही उलट गया!
जो बिसाते-जाँ ही उलट गया, वो जो रास्ते से पलट गया,उसे रोकने से हुसूल क्या? उसे भूल जा…उसे भूल जा। अमजद इस्लाम
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नहीं अक्स कोई भी मुस्तक़िल!
ये जो रात दिन का है खेल सा, उसे देख इसपे यकीं न कर,नहीं अक्स कोई भी मुस्तक़िल सरे-आईना उसे भूल जा। अमजद इस्लाम