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मुस्कुरा के बात करे आश्ना लगे!
वो क़हर दोस्ती का पड़ा है कि इन दिनों,जो मुस्कुरा के बात करे आश्ना लगे| क़तील शिफ़ाई
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रक़ीब की न मुझे बददुआ लगे!
मैं इसलिये मनाता नहीं वस्ल की ख़ुशी,मेरे रक़ीब की न मुझे बददुआ लगे| क़तील शिफ़ाई
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मेरा घर सजा लगे!
मेहमान बन के आये किसी रोज़ अगर वो शख़्स,उस रोज़ बिन सजाये मेरा घर सजा लगे| क़तील शिफ़ाई
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याद बरसती घटा लगे!
गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगे,गुज़रूँ जो उस गली से तो ठंडी हवा लगे| क़तील शिफ़ाई
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मेरे नाम से जल जाते हैं!
जब भी आता है मेरा नाम तेरे नाम के साथ,जाने क्यूँ लोग मेरे नाम से जल जाते हैं| क़तील शिफ़ाई
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गुमनाम से जल जाते हैं!
शमा जिस आग में जलती है नुमाइश के लिये,हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं| क़तील शिफ़ाई
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आतिश-ए-गुलफ़ाम से जल जाते हैं!
बच निकलते हैं अगर आतिश-ए-सय्याद से हम,शोला-ए-आतिश-ए-गुलफ़ाम से जल जाते हैं| क़तील शिफ़ाई
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हम चराग़ों की तरह!
गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं,हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं| क़तील शिफ़ाई
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दिन दिवंगत हुए!
मेरे लिए बड़े भाई और गुरुतुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी ने बहुत सुंदर गीत लिखे हैं और हम युवावस्था में उनके गीत गुनगुनाते रहते थे, जैसे- ‘जितनी दूर नयन से सपना, जितनी दूर अधर से हँसना, बिछुए जितनी दूर कुँवारे पाँव से, उतनी…