Category: Uncategorized
-
जो दिया था वचन खो गया!
यह शहर पा लिया, वह शहर पा लिया,गाँव को जो दिया था वचन खो गया| रामावतार त्यागी
-
मिट्टी के पीछे रतन खो गया!
तन बचाने चले थे कि मन खो गया,एक मिट्टी के पीछे रतन खो गया| रामावतार त्यागी
-
माँ
आज श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी ने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान दिया है|लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता, जिसमें उन्होंने ‘माँ’ को एक अनूठे अंदाज़ में याद किया है – चेहरे परकुछ सख्त अँगुलियों के दर्द-भरे निशान…
-
पता सफ़र में हवा ने नहीं दिया!
मंज़िल, इस महक की कहाँ किस चमन में है,इसका पता सफ़र में हवा ने नहीं दिया| मुनीर नियाज़ी
-
वो वक़्त हमको ज़माने, नहीं दिया!
कुछ और वक़्त चाहते थे कि सोचें तेरे लिये,तूने वो वक़्त हमको ज़माने, नहीं दिया| मुनीर नियाज़ी
-
शहर-ए-यार में आने नहीं दिया!
उस सिम्त मुझको यार ने जाने नहीं दिया,एक और शहर-ए-यार में आने नहीं दिया| मुनीर नियाज़ी
-
वो वहाँ पर नहीं रहा!
वापस न जा वहाँ कि तेरे शहर में ‘मुनीर’,जो जिस जगह पे था वो वहाँ पर नहीं रहा| मुनीर नियाज़ी
-
हाल की हो किस तरह ख़बर!
रहबर को उनके हाल की हो किस तरह ख़बर,लोगों के दरमियां कभी आकर नहीं रहा| मुनीर नियाज़ी
-
किसी के बराबर नहीं रहा!
मुझ में ही कुछ कमी थी कि बेहतर मैं उनसे था,मैं शहर में किसी के बराबर नहीं रहा| मुनीर नियाज़ी