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इस मौसम में!
एक बार फिर से मैं आज पटनावासी श्रेष्ठ कवि जो मेरे आदरणीय मित्र होने के अलावा अभिनेता एवं नेता श्री शत्रुघ्न सिन्हा जी के भी मित्र और पड़ौसी हैं, ऐसे श्री सत्यनारायण जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| वे कवि सम्मेलनों का श्रेष्ठ और गरिमापूर्ण संचालन तो करते ही हैं, मुझे याद आता…
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लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में!
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में| बशीर बद्र
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ज़रा फ़ासले से मिला करो!
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो| बशीर बद्र
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दिखावे की दोस्ती न मिला!
मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला, अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला| बशीर बद्र
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लेकिन ये गुंजाइश रहे!
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों| बशीर बद्र
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क़ब्र से कम दी है ज़मीं!
ज़िंदगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं, पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है| बशीर बद्र
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उजाले अपनी यादों के…
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए| बशीर बद्र