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तोड़ो !
आज स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| रघुवीर सहाय जी ने अज्ञेय जी के बाद प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन का गुरुतर दायित्व संभाला था और लंबे समय तक उस पत्रिका का श्रेष्ठ संपादन किया था|श्री रघुवीर सहाय जी उन कवियों में से एक थे जो कविता में…
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उस हाल में जीना लाज़िम है!
वह मर्द नहीं जो डर जाए, माहौल के ख़ूनी मंज़र से,उस हाल में जीना लाज़िम है, जिस हाल में जीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी
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जलने का क़रीना मुश्किल है!
वह शोला नहीं जो बुझ जाए आँधी के एक ही झोंके से,बुझने का सलीका आसाँ है, जलने का क़रीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी
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इंसान का जीना मुश्किल है!
जो ‘धर्म’ पै बीती देख चुके ‘ईमां’ पै जो गुज़री देख चुके,इस ‘रामो-रहीम’ की दुनिया में इंसान का जीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी
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अब चाके-दिले-इन्सानियत को!
जब नाखूने-वहशत चलते थे, रोके से किसी के रुक न सके,अब चाके-दिले-इन्सानियत को सीते हैं तो सीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी
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इस दौर में जीना मुश्किल है!
यह दौरे खिरद है, दौरे-जुनूं इस दौर में जीना मुश्किल है,अंगूर की मै के धोखे में ज़हराब का पीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी