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ज़ाती मकान थोड़ी है!
जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे,किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है| राहत इन्दौरी
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तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है!
हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है,हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है| राहत इन्दौरी
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हथेली पे जान थोड़ी है!
मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन,हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है| राहत इन्दौरी
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सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है!
लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में,यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है| राहत इन्दौरी
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कोई आसमान थोड़ी है!
अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है,ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है| राहत इन्दौरी
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दृश्य घाटी में!
श्री ओम प्रभाकर जी हिन्दी के एक प्रमुख नवगीतकार हैं| उनका एक नवगीत मुझे बहुत पसंद है- ‘यात्रा के बाद भी पथ साथ रहते हैं’| आज मैं श्री ओम प्रभाकर जी का एक और सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें आज की विसंगतियों को उन्होंने एक अलग अन्दाज़ में प्रस्तुत किया है| लीजिए आज…
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काएँ-काएँ करने लगे!
अजीब रंग था मजलिस का, ख़ूब महफ़िल थी,सफ़ेद पोश उठे काएँ-काएँ करने लगे| राहत इन्दौरी
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झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले!
झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले,वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे| राहत इन्दौरी
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फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे!
ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसू,बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे| राहत इन्दौरी