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उस हाल में जीना लाज़िम है!
वह मर्द नहीं जो डर जाए, माहौल के ख़ूनी मंज़र से,उस हाल में जीना लाज़िम है, जिस हाल में जीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी
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जलने का क़रीना मुश्किल है!
वह शोला नहीं जो बुझ जाए आँधी के एक ही झोंके से,बुझने का सलीका आसाँ है, जलने का क़रीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी
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इंसान का जीना मुश्किल है!
जो ‘धर्म’ पै बीती देख चुके ‘ईमां’ पै जो गुज़री देख चुके,इस ‘रामो-रहीम’ की दुनिया में इंसान का जीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी
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अब चाके-दिले-इन्सानियत को!
जब नाखूने-वहशत चलते थे, रोके से किसी के रुक न सके,अब चाके-दिले-इन्सानियत को सीते हैं तो सीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी
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इस दौर में जीना मुश्किल है!
यह दौरे खिरद है, दौरे-जुनूं इस दौर में जीना मुश्किल है,अंगूर की मै के धोखे में ज़हराब का पीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी
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ख़ामोशी भी है आवाज़ भी है!
मोहब्बत सोज़ भी है साज़ भी है,ये ख़ामोशी भी है आवाज़ भी है| अर्श मलसियानी
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ईश्वर!
आज एक बार फिर मैं स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| जैसे ईश्वर हर जगह पहुँचने के लिए स्वतंत्र होते हैं उसी प्रकार कवि की स्वतंत्रता भी अनंत है| अब इस कविता में ही देखी सर्वेश्वर जी ने ईश्वर को कौन सी ड्रेस पहना दी और उससे क्या काम…