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तुझमें कितनी गहराई है!
देख रहे हैं सब हैरत से नीले-नीले पानी को,पूछे कौन समन्दर से तुझमें कितनी गहराई है| क़तील शिफ़ाई
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उनमें नींद पराई है!
यों लगता है सोते जागते औरों का मोहताज हूँ मैं,आँखें मेरी अपनी हैं पर उनमें नींद पराई है| क़तील शिफ़ाई
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रुस्वाई ही रुस्वाई है!
इक-इक पत्थर जोड़ के मैंने जो दीवार बनाई है,झाँकूं उसके पीछे तो रुस्वाई ही रुस्वाई है| क़तील शिफ़ाई
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इतना सा मेरापन!
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…