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गलियाँ बड़ी सुनसान हैं आए कोई!
कोई आहट, कोई आवाज़, कोई छाप नहीं,दिल की गलियाँ बड़ी सुनसान हैं आए कोई| परवीन शाकिर
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राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं!
अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं,अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई| परवीन शाकिर
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न कभी टूट कर, बिखरे कोई!
जिस तरह ख़्वाब हो गए मेरे रेज़ा-रेज़ा,इस तरह से, न कभी टूट कर, बिखरे कोई| परवीन शाकिर
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तेरा नाम न पढ़ ले कोई!
काँप उठती हूँ मैं सोच कर तन्हाई में,मेरे चेहरे पर तेरा नाम न पढ़ ले कोई| परवीन शाकिर
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बिखरने से न रोके कोई!
अक़्स-ए-ख़ुशबू हूँ, बिखरने से न रोके कोई,और बिखर जाऊँ तो, मुझको न समेटे कोई| परवीन शाकिर
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महक उठे गांव गांव!
स्वर्गीय किशन सरोज जी मेरे अत्यंत प्रिय गीतकार थे, मैंने पहले भी उनके बहुत से गीत शेयर किए हैं, उनसे जो स्नेह मुझे प्राप्त करने को सौभाग्य मिला उसका उल्लेख भी मैंने किया है| अधिकतर मैंने किशन जी के वे गीत शेयर किए हैं जो मंचों पर वे पढ़ते थे| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय…
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झूमर तेरे माथे पे हिला करता है!
रात यों चाँद को देखा है नदी में रक्साँ,जैसे झूमर तेरे माथे पे हिला करता है| क़तील शिफ़ाई
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दिल के धड़कने का गिला करता है!
मैं तो बैठा हूँ दबाये हुये तूफ़ानों को,तू मेरे दिल के धड़कने का गिला करता है| क़तील शिफ़ाई
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जो शाहों को मिला करता है !
देर से आज मेरा सर है तेरे रानों पर,ये वो रुत्बा है जो शाहों को मिला करता है | क़तील शिफ़ाई
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गुंचा तेरे होठों पर खिला करता है!
जो भी गुंचा तेरे होठों पर खिला करता है,वो मेरी तंगी-ए-दामाँ का गिला करता है| क़तील शिफ़ाई