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हँसने को ज़माना है !
हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है, रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है | जिगर मुरादाबादी
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जो अश्क है आँखों में!
ये किसका तसव्वुर है ये किसका फ़साना है, जो अश्क है आँखों में तस्बीह का दाना है| जिगर मुरादाबादी
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सिमटे तो दिल-ए-आशिक़!
इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है, सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है| जिगर मुरादाबादी
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भारत का यह रेशमी नगर!
आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की एक लंबी कविता, देश की राजधानी दिल्ली के बारे में, देश की राजनीति और सामाजिक जीवन, समृद्धि, संस्कृति आदि विभिन्न पक्षों के संबंध में दिनकर जी ने विस्तार से इस कविता में अपने भाव व्यक्त किए हैं| लीजिए प्रस्तुत है यह विशिष्ट कविता– दिल्ली फूलों में बसी, ओस-कण…
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मगर नींद भी न आई हो!
वो तो सोते जागते रहने के मौसमों का फुसूँ,कि नींद में हों मगर नींद भी न आई हो| परवीन शाकिर
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खिड़की से मुस्कराई हो!
कभी तो हो मेरे कमरे में ऐसा मंज़र भी,बहार देख के खिड़की से मुस्कराई हो| परवीन शाकिर
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मेहँदी की बाड़ उगाई हो!
गुलाबी पाँव मेरे चम्पई बनाने को,किसी ने सहन में मेहँदी की बाड़ उगाई हो| परवीन शाकिर
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प्यार हवा मेरे नाम लाई हो!
कोई तो हो जो मेरे तन को रोशनी भेजे,किसी का प्यार हवा मेरे नाम लाई हो| परवीन शाकिर
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रंग मेरे हाथ का हिनाई हो!
हथेलियों की दुआ फूल ले के आई हो,कभी तो रंग मेरे हाथ का हिनाई हो| परवीन शाकिर