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गागर में सागर, मुँदरी में नवरत्न!
गागर में सागर भरे मुँदरी में नवरत्न,अगर न ये दोहा करे, है सब व्यर्थ प्रयत्न| गोपाल दास नीरज
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भूख न जाने शर्म!
भूखा पेट न जानता क्या है धर्म-अधर्म,बेच देय संतान तक, भूख न जाने शर्म| गोपाल दास नीरज
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पालिश करें वे भविष्य के फूल!
जिनको जाना था यहाँ पढ़ने को स्कूल,जूतों पर पालिश करें वे भविष्य के फूल| गोपाल दास नीरज
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सृजन का शब्द !
लीजिए आज एक बार फिर से प्रस्तुत है श्रेष्ठ कवि, कथाकार, उपन्यासकार, निबंध एवं संस्मरण लेखक और धर्मयुग के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता| भारती जी ने इन सभी क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई थी| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की यह कविता– आरम्भ में केवल…
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मुस्कुरा तो दिये थे वो आज ’फ़ैज़!
भूले से मुस्कुरा तो दिये थे वो आज ’फ़ैज़,’मत पूछ वलवले दिले-नाकर्दःकार के| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दिलफ़रेब हैं ग़म रोज़गार के!
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया,तुम से भी दिलफ़रेब हैं ग़म रोज़गार के| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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हौसले परवरदिगार के!
इक फ़ुर्सते-गुनाह मिली, वो भी चार दिन,देखें हैं हमने हौसले परवरदिगार के| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़