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न क्यूँ उर्दू ज़बाँ आई!
मेरे बच्चों में सारी आदतें मौजूद हैं मेरी, तो फिर इन बद-नसीबों को न क्यूँ उर्दू ज़बाँ आई| मुनव्वर राना
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परदेस ले जाएगी फिर शायद!
किसी को गाँव से परदेस ले जाएगी फिर शायद, उड़ाती रेल-गाड़ी ढेर सारा फिर धुआँ आई| मुनव्वर राना
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दुनिया भी आई तो कहाँ आई!
अधूरे रास्ते से लौटना अच्छा नहीं होता, बुलाने के लिए दुनिया भी आई तो कहाँ आई| मुनव्वर राना
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लेकिन न वापस जा के माँ आई!
यहाँ से जाने वाला लौट कर कोई नहीं आया, मैं रोता रह गया लेकिन न वापस जा के माँ आई| मुनव्वर राना
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मेरे हिस्से में माँ आई!
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई, मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई | मुनव्वर राना
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निराला के प्रति
स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी को कवियों का कवि कहा जाता था, अर्थात उनकी कविताओं का अध्ययन करते हुए नए कवि काव्य लेखन सीख सकते हैं, ऐसे भी कह सकते हैं कि जिनकी कविताओं को सामान्य श्रोताओं की अपेक्षा कवियों से, काव्य मर्मज्ञों से अधिक सराहना प्राप्त होती है| श्री सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी हिन्दी…
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कोई सुबह को कोई जाये शाम!
रुके नहीं कोई यहाँ नामी हो कि अनाम,कोई जाये सुबह् को कोई जाये शाम| गोपाल दास नीरज
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मिलावट से बने रोज़ यहाँ सरकार!
करें मिलावट फिर न क्यों व्यापारी व्यापार,जबकि मिलावट से बने रोज़ यहाँ सरकार| गोपाल दास नीरज
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सूख गये जल स्रोत सब!
आँखों का पानी मरा हम सबका यूँ आज,सूख गये जल स्रोत सब इतनी आयी लाज| गोपाल दास नीरज
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घर आते नहीं चिट्ठी पत्री तार!
दूरभाष का देश में जब से हुआ प्रचार,तब से घर आते नहीं चिट्ठी पत्री तार| गोपाल दास नीरज