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तेरी ज़ुल्फ़ों के पेचो-ख़म टूटे!
ज़िन्दगी कंघियों में ढाल हमें,तेरी ज़ुल्फ़ों के पेचो-ख़म टूटे| सूर्यभानु गुप्त
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गुजरे बरसों बरस!
श्री राम कुमार कृषक जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि हैं| मुझे स्मरण है कि मैंने दिल्ली में बहुत समय पहले, उनके साथ कुछ कवि गोष्ठियों में भाग लिया था, उनके साथ उनके मित्र श्री पुरुषोत्तम प्रतीक भी गोष्ठियों में आते थे| कृषक जी का एक गीत उस समय बहुत प्रसिद्ध था- ‘बागड़ की छोकरियाँ’…