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हम पे भी भारी हैं सहर होते तक!
ता-क़यामत शब-ए-फ़ुर्क़त में गुज़र जाएगी उम्र, सात दिन हम पे भी भारी हैं सहर होते तक| मिर्ज़ा ग़ालिब
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ख़ून-ए-जिगर होते तक!
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब, दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होते तक| मिर्ज़ा ग़ालिब
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चाहिए इक उम्र असर होते तक!
आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक, कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक| मिर्ज़ा ग़ालिब
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अडिग- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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उफ़ुक़ पिघलता दिखाई पड़ता है!
जां निसार अख़्तर साहब एक प्रसिद्ध भारतीय शायर थे और फिल्मों के लिए भी उन्होंने अनेक प्रसिद्ध गीत लिखे हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है जां निसार अख़्तर साहब की लिखी यह ग़ज़ल – उफ़ुक़ अगरचे पिघलता दिखाई पड़ता हैमुझे तो दूर सवेरा दिखाई पड़ता है हमारे शहर में बे-चेहरा लोग बसते हैंकभी-कभी कोई चेहरा दिखाई…
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दिखाने का तड़पना नहीं आता!
दुख जाता है जब दिल तो उबल पड़ते हैं आँसू,‘मुल्ला’ को दिखाने का तड़पना नहीं आता| आनंद नारायण मुल्ला
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जिन्हें नाम भी अपना नहीं आता!
भूले थे उन्हीं के लिए दुनिया को कभी हम,अब याद जिन्हें नाम भी अपना नहीं आता| आनंद नारायण मुल्ला
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ख़ताओं पे पनपना नहीं आता!
ज़ाहिद से ख़ताओं में तो निकलूँगा न कुछ कम,हाँ मुझको ख़ताओं पे पनपना नहीं आता| आनंद नारायण मुल्ला
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कहोगे के तड़पना नहीं आता!
तुम अपने कलेजे पे ज़रा हाथ तो रक्खो,क्यूँ अब भी कहोगे के तड़पना नहीं आता| आनंद नारायण मुल्ला