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गालियां खा के बे मज़ा न हुआ!
कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रकीब,गालियां खा के बे मज़ा न हुआ| मिर्ज़ा ग़ालिब
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भूल गलती- मुक्तिबोध
आज गजानन माधव मुक्तिबोध जी की एक प्रसिद्ध रचना शेयर कर रहा हूँ| मुक्तिबोध जी एक क्रांतिकारी कवि थे, अपने समय से आगे की कविताएं लिखी थीं उन्होंने| लीजिए आज प्रस्तुत है गजानन माधव मुक्तिबोध जी की यह कविता जो उनके संकलन ‘चाँद का मुंह टेढ़ा है’ में शामिल थी – भूल-ग़लतीआज बैठी है ज़िरहबख्तर…
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जलती है सहर होते तक!
ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़मर्ग इलाज, शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक | मिर्ज़ा ग़ालिब
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तुम को ख़बर होते तक!
हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन, ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक| मिर्ज़ा ग़ालिब