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हँसते हैं मुझे देख के आते जाते!
मुझको रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद, लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते| राहत इन्दौरी
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मिरी प्यास बुझाते जाते!
मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था, तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते| राहत इन्दौरी
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नए फूल खिलाते जाते!
रेंगने की भी इजाज़त नहीं हमको वर्ना, हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते| राहत इन्दौरी
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कोई ज़ख़्म लगाते जाते!
अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत करके, जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते| राहत इन्दौरी
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तिरे शहर में आते जाते!
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है ,उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते| राहत इन्दौरी
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मिरी जान लुटाते जाते
हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते, जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते | राहत इन्दौरी
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देशगान!
एक बार फिर से मैं आज स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| सर्वेसगवार जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि थे और प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन मण्डल में भी शामिल थे| यह रचना स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी के कविता संकलन ‘खूँटियों’ पर टंगे लोग’ से ली गई…
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ज़ेहनों के वीराने लोग!
हम तो दिल की वीरानी भी दिखलाते शरमाते हैं, हमको दिखलाने आते हैं ज़ेहनों के वीराने लोग| राही मासूम रज़ा
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आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोग!
फिर सहरा से डर लगता है फिर शहरों की याद आई, फिर शायद आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोग| राही मासूम रज़ा
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हँसते हैं जाने पहचाने लोग!
कौन ये जाने दीवाने पर कैसी सख़्त गुज़रती है, आपस में कुछ कह कर हँसते हैं जाने पहचाने लोग| राही मासूम रज़ा