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कठोर हुई ज़िंदगी!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री सोम ठाकुर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।सोम जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत- हमने तो जन्म से पहाड़ जिएऔर भी कठोर हुई ज़िंदगीदृष्टि खंड -खंड टूटने लगीकुहरे की भोर…
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कमरा गीला होता था!
कभी कभी आती थी पहले वस्ल की लज़्ज़त अंदर तक, बारिश तिरछी पड़ती थी तो कमरा गीला होता था| अज़हर फ़राग़
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सिर्फ़ भरोसा होता था!
दीवारें छोटी होती थीं लेकिन पर्दा होता था,ताले की ईजाद से पहले सिर्फ़ भरोसा होता था| अज़हर फ़राग़
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लहू में डूबी थी!
फिर इस के बाद मनाया न जश्न ख़ुश्बू का,लहू में डूबी थी फ़स्ल-ए-बहार क्या करते| अज़हर इक़बाल
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होठों पे सच्चाई रहती है!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं मुकेश जी का गाया फिल्म – जिस देश में गंगा बहती है, का यह गीत अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ- होठों पे सच्चाई रहती है, जिस दिल में सफाई रहती है,हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है। आशा है आपको…
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तिरे बग़ैर समुंदर को!
सफ़ीना ग़र्क़ ही करना पड़ा हमें आख़िर,तिरे बग़ैर समुंदर को पार क्या करते| अज़हर इक़बाल
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कविता को साधना!
प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- हर कदम अभिव्यक्ति काकब कारगर निकला,चेतना के शून्य कापत्थर नहीं पिघला। तनिक कविता का मसौदाजम नहीं पायाएक भाव उधर गयादूजा इधर आया, और फिर जब साधने मेंलगे थे कविवरबीच से तब कसमसाकरशब्द एक उछला। वस्त्र जो हम चाहते हैंपहन ले कवितादेखते हैं अधिकतरउसको नहीं…