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कुछ दिन ठहर के देखते हैं!
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं, सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं| अहमद फ़राज़
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बहारें आएँगी, होंठों पे फूल खिलेंगे!
आज मैं स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ जो किसी समय हिन्दी काव्य मंचों पर गीत का एक प्रमुख हस्ताक्षर हुआ करते थे|लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की यह कविता – बहारें आएँगी, होंठों पे फूल खिलेंगेसितारों को मालूम था, हम दोनों मिलेंगे सितारों को…
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बहुत दिन जी लिया मैंने!
बस अब तो दामन-ए-दिल छोड़ दो बेकार उम्मीदो, बहुत दुख सह लिए मैंने बहुत दिन जी लिया मैंने| साहिर लुधियानवी
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ख़्वाबों में खोकर जी लिया मैंने!
उन्हें अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है, कि कुछ मुद्दत हसीं ख़्वाबों में खोकर जी लिया मैंने| साहिर लुधियानवी
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किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने!
अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ख़ल्वत में, कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने| साहिर लुधियानवी
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ज़हर ये भी पी लिया मैंने!
मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैंने, ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैंने| साहिर लुधियानवी
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अपना हाल तिरी बेबसी से हम!
गर ज़िंदगी में मिल गए फिर इत्तिफ़ाक़ से, पूछेंगे अपना हाल तिरी बेबसी से हम| साहिर लुधियानवी
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गिला न करेंगे किसी से हम!
लो आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उमीद, लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम| साहिर लुधियानवी
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कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम!
तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम, ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम| साहिर लुधियानवी
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शेष!
श्री गंगा प्रसाद विमल जी की पहचान मुख्यतः कथाकार, उपन्यासकार के रूप में होती है परंतु उनके कविता संकलन भी प्रकाशित हुए हैं और एक कवि की भूमिका में भी वे समान रूप से सक्रिय रहे हैं||लीजिए आज प्रस्तुत है श्री गंगा प्रसाद विमल जी की यह लंबी कविता – शेषकई बार लगता हैमैं ही…