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उसके बदन की तराश ऐसी है!
सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है, कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं| अहमद फ़राज़
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बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं!
सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं, सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं| अहमद फ़राज़
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आह भर के देखते हैं!
सुना है उसकी सियह-चश्मगी क़यामत है, सो उसको सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं| अहमद फ़राज़
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हिरन दश्त भर के देखते हैं!
सुना है हश्र हैं उसकी ग़ज़ाल सी आँखें, सुना है उसको हिरन दश्त भर के देखते हैं| अहमद फ़राज़
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चूड़ी का टुकड़ा!
आज एक बार फिर से मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित एक समय के प्रतिनिधि कवियों काव्य संकलन ‘तारसप्तक’ में शामिल रहे स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में शामिल की हैं| सफलता के संकल्प वाला प्रसिद्ध गीत ‘हम होंगे कामयाब’…
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जुगनू ठहर के देखते हैं!
सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं, सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं| अहमद फ़राज़
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रात उसे चाँद तकता रहता है!
सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है, सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं| अहमद फ़राज़
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चलो बात कर के देखते हैं!
सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं, ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं| अहमद फ़राज़
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गली से गुज़र के देखते हैं!
सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उसकी, सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं| अहमद फ़राज़
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बरबाद करके देखते हैं!
सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से, सो अपने आपको बरबाद करके देखते हैं| अहमद फ़राज़