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कुछ भी यहाँ नहीं मिलता!
खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में, तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता| कैफ़ी आज़मी
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शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता!
वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे, कि जिनमें शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता| कैफ़ी आज़मी
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मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता!
जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ, यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता| कैफ़ी आज़मी
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उस पर निशाँ नहीं मिलता!
वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मिरा, किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता| कैफ़ी आज़मी
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नया आसमाँ नहीं मिलता!
मैं ढूँढता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता, नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता| कैफ़ी आज़मी
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तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँ!
हिन्दी गीतों के राजकुंवर के नाम से विख्यात स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी का एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी के बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं, हिन्दी साहित्य और फिल्मी गीतों के क्षेत्र में नीरज जी का अमूल्य योगदान रहा है|लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल दास…
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दर ओ दीवार घर के देखते हैं!
किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे, कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं| अहमद फ़राज़
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उसको ज़माने ठहर के देखते हैं!
रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं, चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं| अहमद फ़राज़