Category: Uncategorized
-
दिल्ली की तस्वीर!
स्वर्गीय रमेश रंजक जी मेरे अत्यंत प्रिय नवगीतकार रहे हैं, जब कविता लिखना प्रारंभ किया था तब मैं उनके नवगीत अक्सर गुनगुनाया करता था| रंजक जी के अनेक नवगीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और उनके बारे में बहुत से संस्मरण भी साझा किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का…
-
शबनम फूल के प्यालों में!
यूँ किसी की आँखों में सुब्ह तक अभी थे हम, जिस तरह रहे शबनम फूल के प्यालों में| बशीर बद्र
-
चुटकी ले नर्म नर्म गालों में!
रात तेरी यादों ने दिल को इस तरह छेड़ा, जैसे कोई चुटकी ले नर्म नर्म गालों में| बशीर बद्र
-
जवाब क्या देते खो गए सवालों में!
पहली बार नज़रों ने चाँद बोलते देखा, हम जवाब क्या देते खो गए सवालों में| बशीर बद्र
-
वफ़ा कम है तेरे शहर वालों में!
सौ ख़ुलूस बातों में सब करम ख़यालों में, बस ज़रा वफ़ा कम है तेरे शहर वालों में| बशीर बद्र
-
मुझे उन का कोई पता नहीं!
इसी शहर में कई साल से मिरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं, उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं मुझे उन का कोई पता नहीं| बशीर बद्र
-
जिसे मैंने चाहा मिला नहीं!
ये ख़ुदा की देन अजीब है कि इसी का नाम नसीब है, जिसे तूने चाहा वो मिल गया जिसे मैंने चाहा मिला नहीं| बशीर बद्र
-
कभी मैंने उसको छुआ नहीं!
उसे पाक नज़रों से चूमना भी इबादतों में शुमार है, कोई फूल लाख क़रीब हो कभी मैंने उसको छुआ नहीं| बशीर बद्र
-
उसे आज तक ये पता नहीं!
सर-ए-राह कुछ भी कहा नहीं कभी उस के घर मैं गया नहीं, मैं जनम जनम से उसी का हूँ उसे आज तक ये पता नहीं| बशीर बद्र
-
मन!
आज फिर से एक बार मैं स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, अवस्थी जी बहुत सरल भाषा में सहजता से अपनी बात कहते थे, जैसे मन से मन का संवाद हो| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत – मन को वश में करोफिर चाहे जो…