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सूखे हुए फूल किताबों में मिलें!
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें| अहमद फ़राज़
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क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं!
रोज़ हम इक अँधेरी धुंध के पार, क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं| राहत इन्दौरी
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ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं!
नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है, ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं| राहत इन्दौरी
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अब भी बाक़ी है!
हिन्दी के एक और प्रतिष्ठित नवगीतकार श्री अनूप अशेष जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| गाँव में किसानों की दयनीय दशा को दर्शाता और हौसला बढ़ाता यह गीत अत्यंत प्रभावी है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अनूप अशेष जी का यह नवगीत – अब तो यह मत कहोकि तुममें रीढ़ नहीं है…