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शाम से जल जाते हैं!
गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं, हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं| क़तील शिफ़ाई
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रोटी का सवाल!
हिन्दी के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि श्री अशोक चक्रधर जी की एक प्रभावशाली कविता आज प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसमें भूखे लोगों के बीच एक रोटी का महत्व बताया गया है|लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता – कितनी रोटीगाँव में अकाल था,बुरा हाल था।एक बुढ़ऊ नेसमय बिताने को,यों ही पूछामन बहलाने…
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दर्द का रस्ता छोड़ दिया है!
एक ‘फ़राज़’ तुम्हीं तन्हा हो जो अब तक दुख के रसिया हो, वर्ना अक्सर दिल वालों ने दर्द का रस्ता छोड़ दिया है| अहमद फ़राज़
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मैं भी जिया हूँ वो भी जिया है!
हिज्र की रुत जाँ-लेवा थी पर ग़लत सभी अंदाज़े निकले, ताज़ा रिफ़ाक़त* के मौसम तक मैं भी जिया हूँ वो भी जिया है|* Companionship अहमद फ़राज़
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उसको क्यूँ बे-ख़्वाब किया है!
अपना ये शेवा तो नहीं था अपने ग़म औरों को सौंपें, ख़ुद तो जागते या सोते हैं उसको क्यूँ बे-ख़्वाब किया है| अहमद फ़राज़
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और आँखों को मूँद लिया है!
अब क्या सोचें क्या हालात थे किस कारन ये ज़हर पिया है, हमने उसके शहर को छोड़ा और आँखों को मूँद लिया है| अहमद फ़राज़
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तमन्ना के सराबों में मिलें!
अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है ‘फ़राज़’, जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें| अहमद फ़राज़
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क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें!
तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा, दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें| अहमद फ़राज़
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शराबें जो शराबों में मिलें!
ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो, नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें| अहमद फ़राज़
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मुमकिन है ख़राबों में मिलें
ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती, ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें| अहमद फ़राज़