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चाँद की लाश कहीं!
सुब्ह-दम सुर्ख़ उजाला है खुले पानी में,चाँद की लाश कहीं से भी उभर सकती है| अज़हर फ़राग़
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आर्थिक संबंधों का गीत!
अपना एक पुराना नवगीत अचानक याद आया, मैंने शायद इसे शेयर नहीं किया है- हैं कहीं महाजन हमकहीं हैं फक़ीरमिटते संबंध ज्योंधुएं की लकीर। अड़ियल मेहमानबना बैठा संत्रासजेबों से निकल गएकितने विश्वास, शो-केसों मेंज़िंदगी जा सजीपढते हम रह गएहाथ की लकीर। खुशियों के आयोजनभार हो गएजड़ता के बंधनस्वीकार हो गए,बुझे हुए सपनेज्यों होली की राखउड़ती…
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हो अगर मौज में !
हो अगर मौज में हम जैसा कोई अंधा फ़क़ीर,एक सिक्के से भी तक़दीर सँवर सकती है| अज़हर फ़राग़
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मेरी ख़्वाहिश है कि!
मेरी ख़्वाहिश है कि फूलों से तुझे फ़त्ह करूँ, वर्ना ये काम तो तलवार भी कर सकती है| अज़हर फ़राग़
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ये मोहब्बत तो!
तुझ से कुछ और त’अल्लुक़ भी ज़रूरी है मिरा,ये मोहब्बत तो किसी वक़्त भी मर सकती है| अज़हर फ़राग़
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मेरा यूट्यूब चैनल
मैं अपने यूट्यूब चैनल पर नियमित रूप से कविताएं- जिनमें मेरी अपनी कविताओं के अलावा अत्यंत श्रेष्ठ कवियों- सोम ठाकुर जी, भारत भूषण जी, किशन सरोज जी आदि के गीत मुकेश जी, जगजीत सिंह जी, गुलाम अली जी, अनूप जलोटा जी आदि द्वारा गाई गई गीत और गज़लें आदि प्रस्तुत करता हूँ। मैं इन सबको…
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कोई भी शक्ल मिरे!
कोई भी शक्ल मिरे दिल में उतर सकती है,इक रिफ़ाक़त में कहाँ उम्र गुज़र सकती है| अज़हर फ़राग़
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जब तक माथा चूम के!
जब तक माथा चूम के रुख़्सत करने वाली ज़िंदा थी,दरवाज़े के बाहर तक भी मुँह में लुक़्मा होता था| अज़हर फ़राग़
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एक थैला, दो शिकन, हम तीन!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक श्रेष्ठ नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ- एक थैला, दो शिकन, हम तीनडूबते सूरज तुझे आमीन! आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद।
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सपना पूरा होता था!
शुक्र करो तुम इस बस्ती में भी स्कूल खुला वर्ना,मर जाने के बा’द किसी का सपना पूरा होता था| अज़हर फ़राग़