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लिए दिल नहीं थोड़ा करते!
शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा, जाने वालों के लिए दिल नहीं थोड़ा करते| गुलज़ार
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ख़्वाबों से आँखें नहीं फोड़ा करते!
जागने पर भी नहीं आँख से गिरतीं किर्चें, इस तरह ख़्वाबों से आँखें नहीं फोड़ा करते| गुलज़ार
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कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते!
लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो, ऐसे दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते| गुलज़ार
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टुकड़े नहीं जोड़ा करते!
जिसकी आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन, ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते| गुलज़ार
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शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते!
हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते. वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते| गुलज़ार
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समर निंद्य है, भाग-1
आज मैं सबसे पहले सभी साथियों को स्वाधीनता दिवस, हमारी आजादी के अमृत महोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं देता हूँ| आज इस अवसर पर मैं राष्ट्रकवि स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, इस कविता का संदर्भ ‘महाभारत’ का है, एक ही शीर्षक से दिनकर जी ने कई कविताएं लिखी हैं,…
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तमाम ग़ुंचे तो खिला नहीं करते!
हर इक दुआ के मुक़द्दर में कब हुज़ूरी है, तमाम ग़ुंचे तो ‘अमजद’ खिला नहीं करते| अमजद इस्लाम अमजद