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कश्ती को उछाला दे दूँ!
डूबते डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ, मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा| अहमद फ़राज़
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ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा!
इतना मानूस न हो ख़ल्वत-ए-ग़म से अपनी, तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा| अहमद फ़राज़
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गुज़रता है गुज़र जाएगा!
आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा, वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा| अहमद फ़राज़
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दान!
आज मैं छायावाद युग के एक और प्रमुख कवि स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| निराला जी ‘राम की शक्ति पूजा’ तथा अन्य अनेक ऐसी श्रेष्ठ रचनाएं लिखकर भारतीय साहित्य में अमर हो गए थे| आज की रचना में ढोंगी दानवीरों को दर्शाया गया है जो हट्टे-कट्टे बंदरों को…
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अब ख़ुशी है न कोई!
अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला, हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला| निदा फ़ाज़ली
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नहीं हो तो बुझ जाना चाहिए!
बिजली का क़ुमक़ुमा न हो काला धुआँ तो हो, ये भी अगर नहीं हो तो बुझ जाना चाहिए| निदा फ़ाज़ली
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कोई दीवाना चाहिए!
चुप चुप मकान रास्ते गुम-सुम निढाल वक़्त, इस शहर के लिए कोई दीवाना चाहिए| निदा फ़ाज़ली
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लोगों से याराना चाहिए!
चौराहे बाग़ बिल्डिंगें सब शहर तो नहीं, कुछ ऐसे वैसे लोगों से याराना चाहिए| निदा फ़ाज़ली
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घटा को बरस जाना चाहिए!
झुकती हुई नज़र हो कि सिमटा हुआ बदन, हर रस-भरी घटा को बरस जाना चाहिए| निदा फ़ाज़ली