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जिसमें कोई पत्थर नहीं गिरता!
समझो वहाँ फलदार शजर कोई नहीं है, वो सहन कि जिसमें कोई पत्थर नहीं गिरता| क़तील शिफ़ाई
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कितने दिन चलेगा!
हिन्दी काव्य मंचों पर ‘गीतों के राजकुंवर’ के नाम से विख्यात स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| जैसा मैंने पहले भी लिखा है नीरज जी ने हिन्दी गीत साहित्य में और फिल्मी गीतों के माध्यम से अपना अमूल्य योगदान किया है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल दास…
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दरिया में समुंदर नहीं गिरता!
गिरते हैं समुंदर में बड़े शौक़ से दरिया, लेकिन किसी दरिया में समुंदर नहीं गिरता| क़तील शिफ़ाई
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तारा तो ज़मीं पर नहीं गिरता!
हालात के क़दमों पे क़लंदर नहीं गिरता, टूटे भी जो तारा तो ज़मीं पर नहीं गिरता| क़तील शिफ़ाई
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अपने पराए पहचाने कहाँ जाते!
‘क़तील’ अपना मुक़द्दर ग़म से बेगाना अगर होता, तो फिर अपने पराए हमसे पहचाने कहाँ जाते| क़तील शिफ़ाई
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ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते!
चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी, वगर्ना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते| क़तील शिफ़ाई
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वो अफ़्साने कहाँ जाते!
तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते, जो वाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़्साने कहाँ जाते| क़तील शिफ़ाई
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मधुशाला भाग-3
आज फिर से मैं आधुनिक हिन्दी गीत के प्रमुख हस्ताक्षर रहे, श्री अमिताभ बच्चन जी के पूज्य पिताश्री और काव्य-मंचों पर अपने गीतों से धूम मचाने वाले प्रातः स्मरणीय हरिवंश राय बच्चन जी की कविताओं को शेयर करने के क्रम में उनकी प्रसिद्ध कृति ‘मधुशाला’ का एक और अंश शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज…