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ख़ाक उड़ा देनी चाहिए!
मैं ताज हूँ तो ताज को सर पर सजाएँ लोग, मैं ख़ाक हूँ तो ख़ाक उड़ा देनी चाहिए| राहत इंदौरी
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आग बुझा देनी चाहिए!
मैं फूल हूँ तो फूल को गुल-दान हो नसीब, मैं आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए| राहत इंदौरी
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नक़ाब उठा देनी चाहिए!
मैं ख़ुद भी करना चाहता हूँ अपना सामना, तुझको भी अब नक़ाब उठा देनी चाहिए| राहत इंदौरी
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ला के छुपा देनी चाहिए!
दिल भी किसी फ़क़ीर के हुजरे से कम नहीं, दुनिया यहीं पे ला के छुपा देनी चाहिए| राहत इंदौरी
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पूँजी लगा देनी चाहिए!
अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में, है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए| राहत इंदौरी
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बहुत छोटी जगह!
आज मैं हिन्दी के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की कविता शेयर कर रहा हूँ, जो बातचीत के लहज़े में सहज रूप से ही दिव्य बात कह जाते थे| भवानी दादा की आज की कविता परिवार के वातावरण पर आधारित है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता…
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दर-ए-ख़ैबर नहीं गिरता!
करना है जो सर मा’रका-ए-ज़ीस्त तो सुन ले, बे-बाज़ू-ए-हैदर दर-ए-ख़ैबर नहीं गिरता| क़तील शिफ़ाई
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लुक़्मा-ए-तर पर नहीं गिरता!
उस बंदा-ए-ख़ुद्दार पे नबियों का है साया, जो भूक में भी लुक़्मा-ए-तर पर नहीं गिरता| क़तील शिफ़ाई
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कोई कंकर नहीं गिरता!
हैराँ है कई रोज़ से ठहरा हुआ पानी, तालाब में अब क्यूँ कोई कंकर नहीं गिरता| क़तील शिफ़ाई