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शाम के वक़्त कभी!
आज फिर से मैं हिन्दी के एक अत्यंत चर्चित और सृजनशील रचनाकार श्री सूर्यभानु गुप्त जी एक रचना शेयर कर रहूँ| श्री सूर्यभानु गुप्त जी के बहुत से शेर मैं अक्सर उद्धृत करता हूँ जैसे- ‘दिलवाले फिरते हैं दर-दर सिर पर अपनी खाट लिए’, ‘जब अपनी प्यास के सहरा से डर गया हूँ मैं’ आदि|…
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नींद उड़ा देनी चाहिए!
मैं ख़्वाब हूँ तो ख़्वाब से चौंकाइए मुझे, मैं नींद हूँ तो नींद उड़ा देनी चाहिए| राहत इंदौरी