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कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं!
यूँ तो हंगामे उठाते नहीं दीवाना-ए-इश्क़, मगर ऐ दोस्त कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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तिरा हुस्न कुछ ऐसा भी नहीं!
ये भी सच है कि मोहब्बत पे नहीं मैं मजबूर, ये भी सच है कि तिरा हुस्न कुछ ऐसा भी नहीं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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सुना भी नहीं देखा भी नहीं!
अरे सय्याद हमीं गुल हैं हमीं बुलबुल हैं, तूने कुछ आह सुना भी नहीं देखा भी नहीं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं!
एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें, और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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तिरी रंजिश-ए-बेजा भी नहीं!
मेहरबानी को मोहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त, आह अब मुझसे तिरी रंजिश-ए-बेजा भी नहीं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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मोहब्बत का भरोसा भी नहीं!
सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं, लेकिन इस तर्क-ए-मोहब्बत का भरोसा भी नहीं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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जो जान और ईमान लेते हैं!
मिरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का जान ओ ईमाँ हैं, निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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हम दूर से पहचान लेते हैं!
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं, तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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वर्षान्त!
आज फिर से मैं आधुनिक हिन्दी के एक प्रमुख कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ जो एक उच्च अधिकारी भी रहे हैं और जैसा मैंने पहले भी लिखा है भोपाल में निर्मित भारत भवन साहित्य एवं संस्कृति कर्मियों के लिए उनकी अमूल्य भेंट है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री…